LT PREPARATION SERIES (ZOOLOGY PART -1)
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TOPIC – जैव विविधता – (A)अकशेरुकी (B) कशेरुकी

(ANIMAL DIVERSITY – (A) NONCHORDATA , (B) CHORDATA )

(A) NONCHORDATA –

नॉनकॉर्डेट का परिचय –
(INTRODUCTION OF NONCHORDATA) –

अकशेरुकी जन्तु (NONCHORDATA) –

  • अकशेरुकी जन्तुओं में कशेरुक दण्ड (vetebral column) नहीं होता।
  • विविध प्रकार के कृमि, स्पंज, प्रवाल, कीट, केकड़े, घोंधे व तारामीन आंदि अकशेरुकी जन्तु हैं।

What type of invertebrate is it?

अकशेरुकी जन्तुओं के सामान्य लक्षण


परिमाण (SIZE) :

  • अकशेरुकी जन्तुओं का आकार सूक्ष्मजीवों से लेकर बड़े जीवों तक होता है | स्विवड की कुल लम्बाई 16.5 मीटर तक होती है।


आकृति (SHAPE)

  • अकशेरुकी जन्तु अनेक आकृतियों के होते हैं।
  • अमीबा का आकार निरन्तर परिवर्तनशील होता है।
  • स्पंज एवम्‌ कुछ सीलेन्द्रेट पौधों के समान स्थिर एवम्‌ शाखित होते हैं।
  • चपटे कृमिफीते के समान तथा एनिलिड कूमिरूप व इकाइनोडर्म (तारामीन) सितारे के आकार के होते हैं|

सममिति (SYMMETRY) :

  • अकशेरूकी जन्तुओं में सभी प्रकार की सममितियाँ देखी जा सकती हैं |
  • अमीवा तथा पोरीफेरा असममित हैं।
  • अधिकांश प्रोय्रोजोआ दिपार्श्व या अरीय सममित होते हैं।
  • कुछ पोरीफेरा तथा सभी सीलेन्द्रेट अरीय सममित होते हैं।
  • प्लेटीहेल्मिन्थीस, एनिलिड व आध्रोपोड-में द्विपा्व सममिति पायी जाती है।

संगठन स्तर (LEVELS OF ORGANISATION) :

  • सरलतम संरचना वाले प्रोटोजोआ में जीवद्रव्यी स्तर (PROTOPLASMIC LEVEL ) का संगठन होता है।
  • स्पंजों में कोशिकीय स्तर (CELLULAR GRADE) का संरचनात्मक संघटन होता है क्योंकि स्पंज की सभी कोशिकाओं में सभी जैव क्रियायें स्वतंत्र रूप से होती हैं।
  • सीलेन्ट्रेट्स में कोशिका-ऊतक स्तर (CELL TISSUE GRADE) पाया जाता है। इनकी कोशिकाओं में श्रम-विभाजन तथा कार्य के अनुरूप आकारिक भिन्‍नता पाई जाती है।
  • चपटे कूमि जन्तुओं में ऊतक-अंग कोटि (TISSUE ORGAN GRADE ) तथा
  • शेष सभी अकशेरूकी जन्तुओं में अंग-तंत्र स्तर (ORGAN SYSTEM GRADE ) का संघटन मिलता है।

खंडीभवन (SEGMENTATION) :

  • एनितिडा व आर्थ्रोपोडा संघ के जन्तुओं का शरीर अनेक समान रण्डों में बंटा होता है।
  • चपटे कृमियों में कूट-खंडीभवन (PSEUDOSEGMENTATION) होता है
  • एनिलिडा तथा आर्थ्रोपोडा संघों में वास्तविक खंडीभवन होता है|

चलन अंग (LOCOMOTORY ORGANS) :

अकशेरूकी जन्तुओं में अनेक प्रकार के चलन अंग पाए जाते हैं : –

  • स्पंज व प्रवाल स्थानवद्ध होते हैं।
  • प्रोटोजोआ में चलन के लिए कूटपाद (PSEUDOPODIA), कशाभ (FLAGELLA ) पक्ष्माभ (CILIA) तथा संकुचनशील मायोनीमी (MYONEMES) पाये जाते हैं। कूटपादों द्वारा प्रोटोजोआ रेंगते हैं , तथा सीलिया व कशाभ द्वारा तैरते हैं व मायोनीमी द्वारा विसर्पण (रेंगना) करते हैं।
  • सीलेन्द्रेट स्थानवद्ध होते हैं तथा बाकी सभी सीलेन्द्रेट्स स्पर्शकों द्वारा गति करते हैं।
  • एनिलिडा में पार्श्वपाद (PARAPODIA) तथा उन पर लगे शूक (SCTAE) चलन अंग होते हैं।
  • जौंक को चूषक आधार से चिपकने और चलन में मदद करते हैं।
  • आर्थोपोड जन्तुओं में संघित पादों (JOINTED LEGS) द्वारा चलन होता है।
  • इकाइनोडर्म नाल पादों (TUBE FEET) से युक्त भुजाओं की मदद से समुद्र के तल पर चलन करते हैं।

आवरण (INTEGUMENT

  • कुछ एककोशिक अकशेरुकी जन्तुओं के शरीर पर कोई आवरण नहीं होता । इनका एककोशिक शरीर कोशिकाकला से ढका रहता है।
  • कुछ प्रोटोजोअन्स पर पेलिकल का रक्षात्मक आवरण होता है।
  • सीलेन्द्रेट्स में epidermis तथा अन्य सभी अकशेरुकी जन्तुओं के शरीर पर क्यूटिकल (cuticle) या काइटिन (CHITINE) का आवरण होता है।

बाह्यकंकाल (EXOSKELETON)

  • कुछ प्रोटोजोआ, सीलेन्ट्रेट्स तथा मौलस्क आदि में CACO3 का बना बाह्य कवच (SHELL) होता है।
  • आर्थ्रोपोडा में काइटिन बाह्यकंकाल बनाता है।
  • पोरीफेरा में कैल्शियम कार्बोनेट, सिलिका या स्पंजिन तन्तुओं का बाह्य कंकाल होता है |
  • इकॉइनोडमेंटा का शरीर CACO3 की बनी प्लेटों से ढ़का होता है। इन पर कंटिकायें भी लगी होती हैं।

अन्तः कंकाल (ENDOSKELETON)

  • अकशेरुकी जन्तुओं में शरीर को अवलम्बन (सहारा) प्रदान करने तथा मांसपेशियों के लिए जुड़ने की सतह उपलब्ध कराने के लिये सुदृढ़ अंतकंकाल नहीं होता।

पृष्ठ आहार नाल (DORSAL ALIMENTARY CANAL)

  • कुछ अकशेरुकी जन्तुओं (प्रोटोजोआ व पोरीफेरा) में आहारनाल होती ही नहीं है।
  • सीलेन्ट्रेट्स में यह आंशिक रूप में होती है। इसे गैस्द्रोवैस्कुलर गुहा (GASTROVASCULAR CAVITY) कहते हैं।
  • शेष सभी अकशेरुकी जन्तुओं में आहारनाल तंत्रिका रज्जु (nerve cord) के ऊपर स्वित होती है। यह शरीर के अगले सिरे पर स्थित मुख से आरम्भ होती है और पश्च सिरे पर गुदा द्वार पर समाप्त होती है।
  • कशेरुकी जन्तुओं की आहार-नाल के ग्रसनीय भाग में गिल छिद्र (GILL SLITS) नहीं होते।

अन्तः एवम्‌ बाह्यकोशिकीय पाचन (ANTRA AND EXTRACELLULAR DIGESTION)

  • प्रोटोजोआ एवम्‌ पोरीफेरा में अन्तः कोशिकीय पाचन (INTRACELLULAR DIGESTION) होता है। यह क्रिया कोशिका के अन्दर खाद्यघानी (FOOD VACUOLE) में होती है।
  • सीलेन्ट्रेट्स में भोजन का अन्तः एवम्‌ बाह्य कोशिकीय दोनों प्रकार से पाचन होता है।
  • अन्य सभी अकशेरुकी प्राणियों में केवल बाह्यकोशिक पाचन होता है।

परिवहन तंत्र (CIRCULATORY SYSTEM)

  • निम्न अकशेरुकी जन्‍्तुओं में परिवहन तंत्र नहीं होता। ‘
  • एनिलिड एवम्‌ इकाइनोडर्म जन्तुओं में परिवहन तंत्र बंद प्रकार का होता है|
  • आर्थ्रोपोडा एवम्‌ मौलस्का में यह खुले प्रकार का या लैक्युनर (LACUNAR) प्रकार का होता है। इनमें रुधिर केशिकायें (BLOOD CAPILLARIES) नहीं होतीं।
  • अकशेरुकी प्राणियों में हृदय आहारनाल के पृष्ठ तल पर स्थित होता है। इनमें यकृत निवाहिका उपतंत्र (HEPATIC PORTAL SYSTEM) नहीं होता हे

श्वसन तंत्र (RESPIRATORY SYSTEM)

  • श्वसन तंत्र का कार्य वायुमण्डल की ऑक्सीजन को ग्रहण कर शरीर की विभिन्‍न कोशिकाओं तक पहुँचाना एवम्‌ co2 को शरीर के बाहर निकालना है।
  • सरल संरचना वाले अकशेरुकी जीवों (प्रोटोजोआ, पोरीफेरा,  सीलेन्ट्रेट्स  तथा बहुत से कृमियों में) गैसों का आदान प्रदान विसरण द्वारा सीधे शरीर की कोशिकाओं के अन्दर होता है। अतः इनमें श्वसन अंग नहीं होते। नम त्वचा द्वारा अथवा डर्मल क्लोमों द्वारा श्वसन होता है।
  • कीटों में श्वसन के लिए ट्रेकियल तंत्र (TACHEAL SYSTEM) होता है।
  • मौलस्क प्राणियों में क्लोम होते हैं।
  • इकाइनोडर्मेटा में चर्मीय क्लोम (DERMAL BRANCHIAE) होते हैं।

उत्सर्जन अंग (EXCRETORY ORGAN)

  • प्रोटोजोआ, पोरीफेरा व सीलेन्ट्रेटा में उत्सर्जी अंग नहीं होते ।
  • उत्सर्जी पदार्थ विसरण द्वारा सीधे बाह्य पर्यावरण में मुक्त कर दिये जाते हैं।
  • चपटे कृमियों में ज्वाला कोशिकायें (flame cell), एनिलिडा
  • मौलस्का में नेफरिडिया तथा कीटों में माल्पीगी नलिकायें (malpighian tubules) उत्सर्जी अंग होते हैं।

तंत्रिका तंत्र (NERVOUS SYSTEM)

सीलेन्ट्रेट में तंत्रिका कोशिकायें एपिडर्मल तथा गैस्ट्रोडर्मल स्तर की कोशिकाओं के आधार पर पूरे शरीर में एक जाल-सा बनाती हैं।
  • प्रोटोजोआ एवम्‌ पोरीफेरा में तंत्रिका तंत्र नहीं होता।
  • मौलस्का व कुछ आर्थ्रोपोडा में GANGLIA मस्तिष्क बनाते हैं। तंत्रिका रज्जु ठोस होता है।
दविपाश्ब सममित अकशेरुकी जन्तुओं (एनिलिडा व आर्थ्रोपोडा में तंत्रिका तंत्र में तंत्रिका बलय (NERVE RING) तथा एक ठोस अधर तंत्रिका रज्जु (VENTRAL NERVE CORD) होते हैं। तंत्रिका वलय शीर्ष भाग में स्थित होता है तथा तंत्रिका रज्जु शरीर की मध्य अधर रेखा पर शरीर के बज सिरे तक आहारनाल के नीचे स्थित होती है। तंत्रिका वलय एवम्‌ तंत्रिका रज्जु में GANGLIA होते हैं|

संबेदी अंग (SENSE ORGAN)

  • अकशेरुकी जन्तुओं में सरल संवेदी अंग होते हैं।
  • कुछ प्रोटोजोआ में संवेदी, अंग नहीं होते किन्तु कशाभी प्रोटोजोअन्स में प्रकाश संबेदी STIGMA होता है।
  • सीलेन्ट्रेट में देहभित्ति में जगह-जगह पर संवेदी कोशिकायें होती हैं।
  • अन्य अकशेरुकी जन्तुओं में संबेदी गर्त (SENSORY PITS), स्टेटोसिस्ट (STATOCYST), प्रकाश संवेदी नेत्र (EYES), स्पर्श ग्राही (TACTIKE RECEPTORS) तथा रसायन गाही संवेदी अंग होते हैं।

जनन क्रिया (REPRODUCTION PROCESS )

  • निम्न अकशेरुकी जीवों में अलैंगिक व लैंगिक जनन होता है |
  • आर्थ्रोपोडा, मौल्स्का ETC में केवल लैंगिक जनन ही होता है।
  • एनिलिडा तथा इकाइनोडर्मेटा में पुर्नजनन की अपूर्व क्षमता होती है।

शीत रुघिरता (COLD BLOODEDNESS)

  • सभी अकशेरुकी जन्तु शीत रूधिर वाले होते हैं।
  • इनके शरीर का तापमान वातावरण के अनुरुप बदलता रहता है।

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