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CHILDHOOD DEVELOPMENT AND PEDAGOGY PART – 1 (COMPLETE NOTES & IMPORTANT QUESTIONS) पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Piaget’s cognitive development theory)

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (Piaget’s cognitive development theory)

Jean Piaje was a medical psychologist from Switzerland, he is famous for his work on child development. Piaget is a major figure in the field of developmental psychology.

जीन पियाजे स्विटजरलैण्ड के एक चिकित्सा मनोविज्ञानी थे ये बाल विकास पर किये गये अपने कार्यों के कारण प्रसिद्ध हैं। पियाजे, विकासात्मक मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी हस्ती हैं।

पियाजे के संज्ञानात्मक विकास को चार मुख्य अवस्थाओं में जाता है |

1 – इंद्रिय जनित गामक अवस्था
( sensory-motor stage) (0-2 year)
2 – पूर्व संक्रियात्मक अवस्था ( pre- operational stage) (2-7 year )
3 – मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (concrete operational stage ) (7-11 year)
4 – अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था ( formal operational stage) (11-15 year)

(1) इन्द्रीयजनित गामक अवस्था(Sensory – motor stage)

यह अवस्था जन्म से 2 वर्ष की अवधि में पूरी होती है। इस अवस्था में वह अपनी मानसिक क्रियाओं को अपनी इंद्रियजनित का क्रियायों के रूप में प्रकट करता है।

शारीरिक रूप से चीजों को इधर-उधर करना | किसी चीज को पकड़ना, अपने भावों को रोककर व्यक्त करना ,जो चाहिए, उसे दिखाकर अपनी बात कहना इसके प्रमुख लक्षण है |

इस अवस्था में किसी वस्तु का अस्तित्व तब तक रहता है। जब तक कि बालक के सामने वह वस्तु उपस्थित रहती है।

IN THE ENGLISH –

(1) Sensory – motor stage
This stage is completed in a period of 2 years from birth. In this state, he reveals his mental activities as the actions of his senses. Physically moving things around and holding something, stopping and expressing their emotions, showing what they want and saying what they want is the main symptom of this. An object remains in this state until then. As long as the object is present in front of the child.

(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था(Pre-operational stage)

यह अवस्था 2 से 7 वर्ष की होती है। इसमें भाषा का विकास ठीक प्रकार से प्रारंभ हो जाता है। इसमें किसी बात की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा होता है। बालक इस अवस्था में संप्रत्यय निर्माण करने लगता है। बालक वस्तुओं को पहचानना और उसमें विभेद करने लगता है परंतु किसी वस्तु के संदर्भ में संप्रत्यय निर्माण अधूरा व दोषपूर्ण होता है।इस अवस्था में बालक सजीव और निर्जीव में भेद करने लगता है।

IN THE ENGLISH –

(2) Pre-operational stage
This condition lasts for 2 to 7 years. In this, the development of language starts properly. In this, language is the medium of expression of something. The child starts creating a theory in this state. The child begins to recognize and differentiate things, but in the context of an object, the concept construction is incomplete and faulty. In this state the child starts to distinguish between the living and the non-living.

(3) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था:(Concrete operational stage)

यह अवस्था 7 से 11 वर्ष तक होते हैं।इस अवस्था में बालक वस्तुओं को पहचानना, विभेद करना ,वर्गीकरण द्वारा समझना सीख जाता है। परंतु बालक उनका समस्या समाधान अमूर्त आधार पर नहीं कर पाता है।बल्कि वह उसका समाधान स्थूल या मूर्त कर पाता है।अगर कोई व्यक्ति किसी समस्या को समझा रहा है। तो वह उस समस्या को नहीं समझ पायेगा। वह किसी समस्या को देख कर ही समझ पाता है।

IN THE ENGLISH –

(3) (Concrete operational stage)These stages are from 7 to 11 years. In this stage, the child learns to recognize, differentiate, understand objects by classification. But the child is not able to solve their problem on intangible basis, but he can solve it in a physical or physical way. If someone is explaining a problem. So he will not understand that problem. He can understand a problem only by looking at it.

(4) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था(Formal operational stage)

यह अवस्था 11 से 15 वर्ष के बीच होती है | इसमें किशोरों का चिंतन अधिकतम लचीला व प्रभावी हो जाता है। चिंतन में क्रमबद्धता पाई जाती हैं। चिंतन में वस्तुनिष्ठता हुआ वास्तविकता पाई जाती है। अवस्था में बालक में विकेंद्रीकरण पूर्णतः विकसित हो जाता है।

IN THE ENGLISH –

(4) Formal operational stage
This stage is between 11 and 15 years old, in which the thinking of the teen becomes maximum flexible and effective. Serialization is found in contemplation. An objective reality is found in contemplation. In this stage, decentralization in the child develops fully.

पूर्व संक्रियात्मक अवस्था के दो प्रमुख दोष निम्न हैं

(1)जीववाद(Animism) :

जीववाद बालकों के चिंतन में पाए जाने वाला वह दोष है।जिसमे वह निर्जीव को सजीव समझता है। जैसे- पंखा , कार बादल सभी को सजीव समझता है।

(2) आत्मकेंद्रीयता:

बालक के विचार में व्यक्तिनिष्ठता पाई जाती है । वह सिर्फ अपने विचार को ही सत्य मान्यता है | जैसे वह यह मानता है , कि जैसे जैसे वह दौड़ता है , वैसे वैसे सूर्य भी तेज दौड़ने लगता है । यह दोनों दोष से 2- 4 वर्ष की अवधि में पाए जाते हैं । 4-7 वर्ष में बालको का चिंतन पहले से अधिक परिपक्व हो जाता है । परंतु चिंतन में उत्क्रमणीय गुण नहीं होती ।

IN THE ENGLISH –

(1) Animism: Jeevism is a defect found in the thinking of children, in which he considers lifeless as living. Like – fan, car cloud considers everyone alive.

(2) Autism: subjectivity is found in the idea of a child. It is only true recognition of his thoughts. As he believes, the sun starts to run faster as he runs. Both of these defects occur over a period of 2–4 years. In 4–7 years the thinking of children becomes more mature than before. But thinking does not have reversible properties.

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