पंवार / परमार वंश
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पंवार / परमार वंश

बैकेट एवं पंवार वंश के शासक सुदर्शन शाह द्वारा लिखित पुस्तक “सभासार” में वर्णित राजाओं की वंशावली के आधार पर यह प्रमाणित होता है |

1 :- कनक पाल

गढ़वाल में पंवार वंश का संस्थापक कनक पाल था , किंतु कनक पाल कहां से आया था | इसके बारे में इतिहासकारों में मैत्यक्ता का अभाव है |

किंतु सबसे प्रमाणित यह है कि 888 ई0 में , एक धार प्रदेश का एक युवा देशाटन हेतु गढ़वाल क्षेत्र में आया | एवं चांदपुर गढ़ी के संस्थापक भानु प्रताप ने उसके साथ अपनी पुत्री का विवाह कर लिया , तथा उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया |

इस प्रकार चांदपुर गढ़ी में परमार वंश की नींव पड़ी | कनक पाल के पश्चात पंवार राजाओं के इतिहास की कोई स्पष्ट जानकारी हमें नहीं मिलती है , इसलिए इस काल को अंधकार युग कहा जाता है |

2 :- अजय पाल

अजय पाल ने इस हिमालयी क्षेत्र के 52 गढ़ों को जीतकर | उनका एकीकरण किया था , तथा उसके पश्चात ही यह क्षेत्र “गढ़वाल” के नाम से जाना गया |

अजय पाल अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से श्रीनगर एवं श्रीनगर से देवलगढ़ ले गया |यहीं पर पंवारों की आराध्य देवी राजराजेश्वरी का मंदिर बनाया गया |

माना जाता है , कि 52 गढ़ों को जीतने के पश्चात अजय पाल को भी युद्धों से विरक्ति हो गई थी |इसलिए वह देवलगढ़ में सत्यनाथ आश्रम में गोरखपंथ के प्रभाव में आ गया | तथा कुछ इतिहासकारों ने अजय पाल को पंवार वंश का “अशोक” कहा है |

भारकवि ने अपनी पुस्तक “मनुदेय काव्य” में अजय पाल की तुलना कृष्ण , कुबेर और युधिष्ठिर से की है |

अजय पाल ने कत्यूरी शासक को हराकर उसके सिंहासन को श्रीनगर लाया था |

3 :- सहजपाल

सहजपाल अकबर के समकालीन था | यद्दपि पूरे उत्तर भारत पर अकबर ने अपना अधिकार किया था , किंतु सहजपाल तब भी स्वतंत्र रूप से शासन कर रहा था |

4 :- बलभद्रशाह

यह पहले राजा थे जिन्होंने शाह की उपाधि ली |

5 : – मानशाह

इसके समकालीन चंदवंश के शासक लक्ष्मीचंद था | जिसने गढ़वाल क्षेत्र पर 7 बार आक्रमण किया था | मानशाह के सेनापति ने चंपावत को जीता था |

6 :- श्याम शाह

यह मुगल बादशाह जहांगीर के समकालीन थे | तथा “जहांगीरनामा” में यह उल्लेख मिलता है , कि मुगल दरबार में श्रीनगर के शासक को घोड़े और हाथी उपहार स्वरूप दिए गए |

7 :- महपतिशाह

महपति शाह ने तिब्बत पर 3 बार आक्रमण किया था | किंतु प्रतिकूल परिस्थितियों एवं स्थानीय जनता के विरोध के कारण इन्हें सफलता नहीं मिली | इन आक्रमणों में इनके तीन सेनानायक माधो सिंह , भंडारी रखौला , लोधी बनवारी दास की प्रमुख भूमिका थी |

नोट :- उत्तराखंड के इतिहास में माधो सिंह भंडारी को गर्भभंजक के रुप में जाना जाता है इन्होंने मलेथा गूल का निर्माण करवाया था |

8 :- पृथ्वी शाह

पृथ्वी शाह 7 वर्ष की आयु में अपनी माता रानी कर्णावती के संरक्षण में शासक बने | इनके समय 1632 में मुगल गवर्नर नवाजत खान ने इस घाटी पर आक्रमण किया |

रानी कर्णावती अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुये , रानी कर्णावती ने मुगल सैनिकों के नाक और कान कटवा दिए | इसलिए इतिहास में इसे नाक कटी रानी के नाम से जाना जाता है |

पृथ्वी शाह ने ही शहजादे सुलेमान शिकोह को श्रीनगर में संरक्षण प्रदान किया था | सुलेमान ने दो चित्रकार श्यामदास , हरदास पृथ्वीशाह को भेंट किए थे |

9 :- फतेहशाह

फतेहशाह साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई |

सिरमौर के राजा से युद्ध करके पोंटा साहिब एवं जौनसार भाबर को जीता था | तथा सहारनपुर के कुछ क्षेत्रों को जीतकर , वहां पर फतेहपुर नामक नगर बसाया था |

फतेहशाह एवं सिख सेना के बीच भैगणी का युद्ध हुआ था , जो एक समझौते पर समाप्त हुआ | उन्होंने सिख गुरु रामराय को गुरुद्वारे के के निर्माण में सहायता प्रदान की थी |

इनके दरबार में नवरत्न रहते थे |

10 :- प्रदीप शाह

इनके समकालीन चंदवंशीय शासक कल्याण चंद था |

जिस पर रूहोला आक्रमण किया था | इन्होंने रोहेला आक्रमण के समय कल्याण चंद की सहायता की थी | तथा संधि के तहत कल्याण चंद पर लगे 3 लाख के जुर्माने को भी भरा था |

11 : – ललितशाह

ललितशाह के 2 पुत्र थे | जयकृतशाह , प्रद्युम्नशाह इन के समय कुमाऊँ का चंद वंश राजनैतिक अस्थिरता का शिकार था |

हर्ष देव जोशी के आमंत्रण पर इन्होंने चंद वंश पर आक्रमण किया | एवं विजय हासिल करके वहां की गद्दी पर अपने छोटे बेटे प्रद्युम्नशाह को बिठाया |

हर्षदेव जोशी को कुमाऊँ का चाणक्य भी कहा जाता है |

ललित शाह की मृत्यु मलेरिया से हुई थी |


12 : – प्रद्युम्नशाह

कुमाऊँ के चंद वंश के राज्य पर जब ललितशाह का अधिकार हो गया | तो ललितशाह अपने छोटे बेटे प्रद्युम्नशाह को कुमाऊँ का शासक बनाया |

प्रद्युम्न शाह एकमात्र पंवार वंश राजा है जो चंद वंश की गद्दी पर बैठा था |

ललित शाह की मृत्यु के पश्चात गढ़ देश का सिंहासन जयकृत शाह ने संभाला था | तथा आपसी वैमनस्थ के कारण जयकृतशाह एवं प्रदुम्नशाह में सदैव शत्रुता का भाव रहा | जयकृतशाह ने लगातार प्रद्युम्नशाह के विरुद्ध षड्यंत्र करे | और शुरू में प्रद्युम्नशाह ने देवलगढ़ और श्रीनगर पर आक्रमण किया , और 3 वर्ष पश्चात वापस चला गया |

किंतु इसी दौरान जयकृतशाह अनेक षडयंत्रो और आक्रमणों के शिकार रहे | अंततः 1786 में प्रद्युम्नशाह ने पुनः श्रीनगर और देवलगढ़ पर आक्रमण किया । तथा जयकृत शाह महल छोड़कर देवप्रयाग में रघुनाथ मंदिर में रहने लगे | वहीं पर इनकी मृत्यु हो गई तथा इनकी रानियां सती हो गई |

गद्दी पर बैठने के पश्चात कत्यूरी राजाओं के बाद यह एकमात्र मौका था | कि जब गढ़वाल और कुमाऊं दोनों एक ही राजा के अधीन थे | 1786 में कुमाऊँ को जीतने के पश्चात गोरखाओं ने हस्तीदल चौतरिया , अमर सिंह थापा के नेतृत्व में गढ़वाल पर आक्रमण करते हुए , लंगूर गढ़ी को घेरा , किन्तु इसे जीतने में सफल नहीं हो सके | उन्होने आसपास के क्षेत्रों में लूटपाट की तथा फिर से एक बार लंगूरगढ़ी को घेरने का प्रयास किया | किंतु उसी दौरान काठमांडू पर चीनी आक्रमण के डर से गोरखा वापस लौट गए |

1803 में गढ़वाल क्षेत्र में भयंकर भूकंप आया | जिसमें गढ़वाल क्षेत्र को अपार नुकसान हुआ | इस आपदाग्रस्त गढ़वाल पर गोरखाओं ने आक्रमण किया | प्रदुम्नशाह राजधानी को छोड़कर दून घाटी की ओर निकल पड़े | किंतु गोरखा उनका पीछा करते-करते दूर घाटी तक आ पहुंचे | फलस्वरूप प्रदुम्नशाह ने सहारनपुर के राजा के यहां शरण ली । तथा अपना सब कुछ बेच कर | 10,000 की एक सेना एकत्र की |

1804 में देहरादून के खुडबुड़ा नामक स्थान पर गोरखाओं तथा प्रद्युम्नशाह के मध्य एक प्रसिद्ध युद्ध हुआ | इस युद्ध में प्रद्युम्नशाह को वीरगति प्राप्त हुई | और गोरखाओं ने उनके पुत्र प्रीतमशाह को बंदी बनाकर काठमांडू भेजा |

उनके छोटे पुत्र सुदर्शन शाह हरिद्वार में निरंतर स्वतंत्र होने का प्रयास करते रहे |

13 :- सुदर्शन शाह

सुदर्शन शाह से समझौता करने के लिए दिल्ली के ब्रिटिश रेजिमेंट को नियुक्त किया गया | उन्होंने फ्रेजर को सुदर्शन शाह के साथ समझौता करने हेतु भेजा |

1815 में गिलेस्पी के नेतृत्व में एक ब्रिटिश सेना दून घाटी की ओर निकल पड़ी | इसी दौरान ब्रिटिश आक्रमण को भांपते हुये , गोरखा सेनापति कैप्टन बलभद्र सिंह ने देहरादून नालापानी में एक टीले पर पत्थर और लकड़ी से एक किले का निर्माण करवाया |

अक्टूबर , 1815 ! को गोरखाओं और अंग्रेजों के मध्य प्रसिद्ध खंगला (सैन्य छावनी) का युद्ध हुआ | युद्ध में गोरखा ने अभूतपूर्व वीरता का परिचय दिया , किंतु गोरखाओं की हार हुई | फलस्वरूप गोरखाओं और अंग्रेजो के बीच संगौली संधि हुई |

संगौली संधि जिसके तहत उन्होंने दून घाटी , तराई क्षेत्र एवं गढ़वाल , कुमाऊं पर गोरखाओं ने अपना अधिकार छोड़ दिया |

अंग्रेजों को संधि के तहत दी जाने वाली राशि न देने के कारण अंग्रेजों ने कुमाऊं क्षेत्र , दून घाटी एवं पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र , (जिसे बाद में “ब्रिटिश गढ़वाल” कहा गया) पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया |

सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी श्रीनगर से हटाकर टिहरी गढ़वाल को राजधानी बनाया |

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