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टिहरी रियासत में शिक्षा

प्रारंभिक टिहरी के शासकों ने ( जिनमें सुदर्शन शाह एवं भवानी शाह प्रमुख थे |) ने शिक्षा को कोई उचित महत्व नहीं दिया | इसलिए यह देश के प्रति उदासीन रहे|

किंतु प्रताप शाह ने शिक्षा के माध्यम को अंग्रेजी बना करके सभी कबीलियाई समाज को आधुनिक समाज बनाने की दिशा में सार्थक कदम उठाया |

कीर्ति शाह ने प्रताप हाई स्कूल एवं हीवेट संस्कृत पाठशाला के माध्यम से , इस क्षेत्र में शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया | वास्तव में एक क्रांतिकारी कदम था |

इसके अतिरिक्त नरेंद्र शाह द्वारा न केवल शिक्षा का उच्चीकरण किया गया | बल्कि रियासत से बाहर भी विद्यालय स्थापित किए | और उनको आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई | जिनमें लैंसडाउन ,श्रीनगर , कर्णप्रयाग विद्यालयों को आर्थिक सहायता दी |

यही नहीं कीर्तिशाह ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को ₹100000 आर्थिक सहायता दी थी |जिसमें विश्वविद्यालय ने एक चेंबर निर्माण किया था | तथा इसका जिसके द्वारा आज भी शोध करने वाले छात्रों को आज भी स्कोलरशिप दी जाती है।

टिहरी रियासत में सैन्य एवं न्याय प्रशासन

पंवार काल में सेना को अनेक भागों में बांटा गया था | जिन्हें पलटन कहा जाता था | इन पलटनो को बधाण या सलाण नाम से जाना जाता था |

सेना पारंपरिक तरीके से युद्ध लड़ती थी | जिसमें धनुष , बाण , ढाल , तलवार एवं बंदूकों का प्रयोग होता था | हालांकि कवि मोलाराम के अनुसार सेना ने छोटी तोपों का भी इस्तेमाल होता था |

न्यायिक व्यवस्था के तहत सुदर्शन शाह दीवानी एवं फौजदारी अदालतों का गठन किया था | तथा ग्रामीण विवादों को पंचायत के माध्यम से | इसी स्तर पर सुलझा लिया जाता था | सर्वोच्च न्यायाधीश राजा होता था |

नरेंद्र शाह ने कानून को संहिताबद्ध किया था | एवं हाईकोर्ट की भी स्थापना की थी |

इस प्रकार देखते हैं कि पंवार शासकों को शासन प्रशासन के सभी क्षेत्रों को व्यवस्थित एवं संगठित करने का प्रयास किया इनमें उन्हें सफलता भी मिली |

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