कत्यूरी वंश 7 वीं से 15 वीं सदी

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हर्षवर्धन के पश्चात उत्तराखंड क्षेत्र में अनेक छोटे-छोटे राजवंशों का उद्भव हुआ । जिनमें ब्रह्मपुर , गोविषाण, शत्रुघन आदि राज्य प्रमुख थे । ब्रह्मपुर राज्य के पतन के पश्चात 7वीं सदी में बसंत देव ने अल्मोड़ा में बैजनाथ के समीप कार्तिकेयपुर नामक स्थान पर इस वंश की स्थापना की | कत्यूरी शासकों ने न केवल हिमालय क्षेत्र को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया , अपितु पहली बार आने वाली पीढ़ियों के लिए वास्तुकला की एक सुंदर धरोहर सौंपी|

क्योंकि कत्यूरी ही उत्तराखंड का पहला वंश है , जिसके बारे में हमें जानकारी क्रमबद्ध रूप में मिलती है| तथा विभिन्न स्रोतों में मिलती है इसलिए कत्यूरी राजवंश को उत्तराखंड का पहला ऐतिहासिक राजवंश माना जाता है|

अभी तक विभिन्न स्थानोंसे कत्यूरी शासकों के 9 अभिलेख प्राप्त हुए हैं , तथा इन से यह पता चलता है| कि कत्यूर क्षेत्र पर 7 राजवंशों ने शासन किया था ।

1 :- बसंतदेव वंश

  • यह कत्यूर वंश का संस्थापक था |
  • इसने परमभागवत तथा महाधिराज की उपाधि ली । जिससे यह स्पष्ट होता है , कि इसने एक स्वतंत्र सत्ता स्थापित की थी|
  • इसने बागेश्वर में एक देव मंदिर को स्वर्णेश्वर नामक गाँव दान में दिया था|

2 :- खरपर देव राजवंश

  • इस वंश के समय कन्नौज के राजा यशोवर्मन तथा कश्मीर के राजा ललितादित्य मुक्तापीठ ने गढ़वाल क्षेत्र पर आक्रमण किया था |
  • इस वंश का सबसे प्रमुख शासक कल्याणनाथ तथा लद्धादेवी का पुत्र त्रिभुवनराज थ | इसने किरातपुत्र से संधि की |एवं व्याघ्रेश्वर मंदिर को भूमि दान में दे दी थी |

3 :- राज निम्बर राजवंश

  • नालंदा अभिलेख से पता चलता है | कि इस समय गढ़वाल क्षेत्र पर धर्मपाल ने आक्रमण किया था, तथा इसी का लाभ उठाकर निम्बर देव शासक बना |
  • किंतु इस वंश का प्रमुख शासक ईष्टगण था | इसने पहली बार पूरे गढ़वाल को एकीकृत करने का प्रयास किया था |

4 :- सलौणादित्य राज वंश

  • इस वंश की स्थापना ईष्टदेव ने की थी | तथा अपने पिता के नाम पर इस वंश का नाम सलौणादित्य राजवंश रखा |

5 :- पाल वंश

  • बैजनाथ अभिलेख के अनुसार 10 वीं तथा 12 वीं सदी इस क्षेत्र पर पालों ने आक्रमण किया | तथा इसका प्रमाण यहां पर शासन करने वाले लखनपाल , त्रिभुवनपाल आदि राजाओं से मिलता है |

6 :- क्रांचल देव वंश

  • गोपेश्वर के त्रिशूल अभिलेख से इस बात का पता चलता है , कि 1223 ईo में क्रांचल ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया था । एवं 1268 ईo के आसपास इसके पुत्र अशोक चल्ल ने नेपाल में मल्ल वंश की स्थापना की |

7 :- असांतिदेव वंश

  • यह कत्यूरियों में आखिरी वंश या इसके पश्चात इसका पुत्र ब्रह्मदेव शासक बना |
  • यह अत्याचारी शासक था | एवं तैमूर लंग के आक्रमण का ब्रह्मदेव ने ही हरिद्वार में सामना किया था | यह इस वंश का सम्भवतः आखिरी राजा था |

“प्रारंभिक राजधानी – जोशीमठ”

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कत्यूरियों का प्रशासन

  • कत्यूरी राजव्यवस्था राजतंत्र पर आधारित थी | एवं राज्य का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं राजा होता था | किंतु राजा को प्रशासनिक सहायता देने के लिए उसके कुछ अधिकारी होते थे | जैसे – राजतम्य (सलाहकार) , महासामंत (सेनापति) , कार्यप्रधान (मिस्त्री) , प्रांतपाल (सीमा सुरक्षा अधिकारी) आदि |
  • राजा का आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व , भोग तथा शुल्क प्रमुख कर थे | एवं भूमि बंदोबस्त के लिए कुछ अधिकारियों का वर्णन मिलता है | जैसे क्षेत्रपाल (भूमि उत्पादन को बढ़ाने से संबंधित अधिकारी) , प्रभांतर (भूमि को मापने वाला अधिकारी ) , उपचारिक (भूमि का रिकॉर्ड रखने वाला अधिकारी) |

“भूमि को मापने के लिए “वाप” अन्न की मात्रा “

द्रोणवाप = 32 सेर

कुल्यावाप = 8 द्रोण

खारिवाप = 20 द्रोण प्रयुक्त होती थी |

नोट :- कत्यूरियों की राजभाषा संस्कृत एवं आम बोलचाल की भाषा पाली थी | जबकि भ्रामरी देवी उनकी कुलदेवी का नाम था |

NEXT : – पंवार / परमार वंश

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