उत्तराखंड में वन

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उत्तराखंड में ऊंचाई तथा इसकी जलवायु में विषमता है | तथा वनस्पति जलवायु का अनुसरण करती है | इसलिए वनस्पतियों के आवरण में भी विषमता पाई जाती है | उत्तराखंड के दक्षिण में तराई भाबर प्रदेश से लेकर उत्तर में हिमच्छादित पर्वतों तक क्रमशः उष्प, उपोष्ण शीतोष्ण एवं अल्पाइन वनो की एक मेखला है |

वनस्पति की उपस्थिति पर उच्चावच विषमता, ढाल की दिशा, भू गर्भिक संरचना ,मृदा, तापमान, वर्षा आदि का प्रभाव पड़ता है | अध्ययन की सुविधा के लिए उत्तराखंड के वनों को 7 भागों में बांटते हैं जो निम्न प्रकार से है |

1 – उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन

2 – उष्ण कटिबंधीय आर्द्र पतझड़ वन

3 – उष्ण कटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन

4 – उपोष्ण कोणधारी वन

5 – पर्वतीय शीतोष्ण वन ( उपोष्ण पर्वतीय वन )

6 – अल्पाइन वन

7 – अल्पाइन झाड़ियाँ या घास के मैदान

1 – उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन

ये वन ऐसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं | जहां पर तापमान 24 डिग्री सेंटीग्रेड से 26 डिग्री सेंटीग्रेड के बराबर होता है | तथा वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है |

इन वनों के वृक्ष सदा हरे – भरे रहते हैं | वृक्षों की ऊंचाई अधिक होती है | एवं इनके वनों के सहारे अनेक लताएं फैली रहती हैं |

2 – उष्णकटिबंधीय आर्द्र पतझड़

उष्णकटिबंधीय आर्द्र पतझड़ वनों वाले क्षेत्रों में तापमान लगभग 20 डिग्री सेंटीग्रेड तक होता है | एवं वर्षा 100 से 200 सेंटीमीटर तक होती है | उत्तराखंड में इनका विस्तार शिवालिक के दक्षिण ढलान , दून घाटी एवं तराई क्षेत्रों में अधिक होता है |

इन्हें मानसूनी वन भी कहा जाता है | यहां पर साल, सालगौव, पलाश, हल्दू, बांस, शहतूत आदि प्रमुख रूप से पाए जाते हैं | जिनमें साल और सालगौव का विशेष आर्थिक महत्व है |

3 – उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन

उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ वन उत्तराखंड के थोड़े ही भूभाग पर है |

ऐसे क्षेत्र जहां पर तापमान 18 डिग्री सेंटीग्रेड से 20 डिग्री सेंटीग्रेड तक होता है | तथा वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर तक होती है | वहां पर यह वन पाए जाते हैं |

इन वृक्षों की ऊंचाई कम होती है | तथा यहां पर साल, पलाश, सेमल, गुलर , जामुन , बेर के वृक्ष पाए जाते हैं |

4 – उपोष्ण कोणधारी वन

उपोष्ण कोणधारी वन 900 मीटर से 1800 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं | इनमें चीड , बांज, बुरांश आदि मुख्य वृक्ष पाए जाते हैं |

चीड़ के वृक्ष की औसत ऊंचाई 20 से 25 सेंटीमीटर तक होती है | एवं इन वनों के मध्य कई प्रकार की घास उगती है | जिनसे जानवरों का चारा प्राप्त किया जाता है |

इन वनों का एक प्रमुख वृक्ष बांज है | जो न केवल पर्वतीय लोगों के दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है | बल्कि यह जल संचय करता है | तथा इस पेड़ से एक सुगंध निकलती है | जो पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखती है | इसलिए इस पेड़ को हरा सोना भी कहा जाता है |

5 – पर्वतीय शीतोष्ण वन उपोष्ण पर्वतीय वन

पर्वतीय शीतोष्ण वन उपोष्ण पर्वतीय वन 1800 से 2700 मीटर की ऊंचाई पर यह वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं , जहां वर्षा 125 से 200 सेंटीमीटर के बराबर होती है |

इसका विस्तार कुमाऊँ से लेकर हिमालय क्षेत्र तक है | किंतु इनमें निरंतरता का अभाव है | इन वनों में 1800 से 2200 मीटर तक चीड़ के तथा 2200 से 2700 मीटर तक देवदार के वन पाए जाते हैं | इसके अलावा यहां पर ओंक, मोरू, बांज आदि वृक्ष पाए जाते हैं |

(खिरसू बांज की प्रजाति)

6 – अल्पाइन वन

अल्पाइन वन 2500 से 3400 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अल्पाइन वन पाए जाते हैं |

यहां पर सिल्वर फर , ब्लू-पाइन, स्प्रूस, देवदार , (भोजपत्र) वर्च आदि के पेड़ पाए जाते हैं |

इसके अलावा इन वनों के मध्य बुरांश के पेड़ पाए जाते हैं |

इन वनों के वृक्ष तैलीय या oily होते हैं | इसके कारण से ये कच्चे ही जल जाते हैं |

7 -अल्पाइन झाड़ियां या घास के मैदान

अल्पाइन झाड़ियां या घास के मैदान 3300 से 3700 की ऊंचाई पर झाड़ियों एवं घास के मैदानों का विस्तार है |

यहां पर सिल्वर वर्च और देवदार जैसे वृक्ष तथा जूनिफर विलो जैसी झाड़ियां पाई जाती है |

यहीं पर घास के मैदान भी पाए जाते हैं , जिन्हें बुग्याल या दयारा भी कहा जाता है | इन बुग्यालों का पशुचरण और औषधिक दृष्टि से विशेष महत्व है |

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