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उत्तराखंड में पायी जाने वाली मिट्टी और मिट्टी के प्रकार

उत्तराखंड में मिट्टी
तालाब / नदी घाटी की भूमि मैदानी भागों की भूमि पर्वतीय ढल युक्त भूमि / उखड

उत्तराखंड एक कृषि प्रधान राज्य है | तथा जनसंख्या का एक बड़ा भू – भाग आज भी कृषि कार्यों में संलग्न है |

यद्यपि उत्तराखंड को कृषि के दृष्टिकोण से एक समृद्धशाली प्रदेश नहीं कहा जा सकता है | परंतु यहां पर सभी प्रकार की खेती थोड़ी बहुत मात्रा में हो जाती है |

यहां खाद्यान्न फसलों के रूप में धान, गेहूं, जौ, बाजरा, मांडवा कौड होती है | एवं दलहन फसलों में राजमा, चना, भट्ट, तोर, गहथ आदि की खेती होती है |

जबकि पर्वत क्षेत्रों में तापमान कम होने के कारण फलों का उत्पादन भी होता है | जिसमें से अखरोट, नाशपति एवं संतरा खुमानी आदि प्रमुख हैं | उत्तराखंड की भूमि संरचना को देखते हुए , भूमि को तीन भागों में बांटा गया है | जो निम्न प्रकार से है –

1 – तालाब / नदी घाटी की भूमि, 2 – मैदानी भागों की भूमि, 3 – पर्वतीय ढल युक्त भूमि / उखड

1 – तालाब / नदी घाटी की भूमि,

उत्तराखंड में नदियां अपने प्रवाह मार्ग के सहारे विशाल उर्वरक मैदानों का निर्माण करती है |

इन मैदानों में सिंचाई सुविधा भी उपलब्ध होती है | मिट्टी उपजाऊ होने के कारण यहां पर गेहूं , धान की खेती की जाती है |

यह मध्यम कृषि क्षेत्र वाला प्रदेश है | और उत्तराखंड में सिंचित भूमि को तलाव कहा जाता है |

2 – मैदानी भाग की समतल भूमि

इसमें संपूर्ण तराई भाबर क्षेत्र आता है | जिसमें देहरादून , हरिद्वार , उधमसिंह नगर एवं नैनीताल का कुछ भाग आता है |

यहां पर समतल एवं उर्वरक मैदान है | तथा इन मैदानों में कृषि सर्वाधिक विकसित अवस्था में मिलती है |

इन क्षेत्रों में गेहूं , धान , गन्ना एवं दलहनी फसलों का उत्पादन अधिक होता है

3 – पहाड़ी ढालों की कृषि भूमि

उत्तराखंड में पहाड़ों पर सीढ़ीदार खेती होती है |

सिंचित भूमि ना होने के कारण स्थानीय भाषा में इसे उखड़ कहा जाता है | यह कृषि वर्षा पर आधारित होती है |

जिस कारण उत्पादन कम तथा अनियंत्रित होता है | इसलिए वर्तमान में लोग कृषि कार्यों को छोड़कर अन्य व्यवसायों में संलग्न हो गए हैं |

ICAR (दिल्ली भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) ने उत्तराखंड की मिट्टी को पर्वतीय या वनीय मिट्टी कहा है |

किंतु यदि हम स्थानीय रूप में देखें तो मिट्टी के संगठन के आधार पर उत्तराखंड में निम्न प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं –

1 – तराई मिट्टी

यह मिट्टी उत्तराखंड राज्य के दक्षिणी भाग में देहरादून से उधम सिंह नगर तक फैली है |

यह बारीक कणों की मिट्टी है | यह अधिक परिपक्व है | तथा इस मिट्टी में नाइट्रोजन तथा फास्फोरस की कमी देखने को मिलती है |

यह मिट्टी समतल , दलहनी , नम और उपजाऊ होती है | यहां पर गन्ना और धान की फसल सर्वाधिक होती है |

2 – भाबर मिट्टी

यह तराई के उत्तर तथा शिवालिक के दक्षिण में देखने को मिलती है | यहां पर मिट्टी पथरीली एवं कंकड़ पत्थर से युक्त होती है | पानी की कमी के कारण यह अनउपजाऊ होती है |

3 – चारगाही मिट्टी

यह मिट्टी नदियों और जल धाराओं के किनारे सर्वाधिक मात्रा में पायी जाती है |

4 – टर्शियरी मिट्टी

ये हल्की बलुई छिद्रयुक्त एवम कम आर्द्रता धारणा करने वाली मिट्टी होती है | ये शिवालिक एवम दून घाटी में पाई जाती है | इसमें वस्पतियों की अधिकता होती है |

5 – क्वाटर्ज मिट्टी

यह मिटटी सामनायतः भीमताल , नैनीताल क्षेत्रों में पायी जाती है

6 – ज्वालामुखी मिट्टी

इस मिटटी का निर्माण सामान्यतः आग्नेय चट्टानों से हुआ है | ये भी नैनीताल के भीमताल क्षेत्रों में पाए जाते है |

7 – दोमट मिट्टी

दोमट मिट्टी दून घाटी में पाई जाती है | इसमें चूना तथा लौह अंश की अधिकता होती है |

8 – भूरी लाल पीली मिट्टी

इस मिटटी का निर्माण चूना ,बलुआ , पत्थर और डोलो माईट से हुआ है |और इसका क्षेत्र श्रीनगर , मसूरी , चकराता स्थानों में है | (गैल्विनिकरण एक प्रक्रिया है जिसमे जिंक की परत लोहे पर लगायी जाती है )

9 – लाल मिट्टी

पहाड़ी ढालों और पर्वतों के किनारे पायी जाती है | एवं इस मिट्टी का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में लिपाई के लिए विशेष होता है |

10 – वनों की भूरी मिट्टी

11 – भस्मी मिट्टी

12 – उच्चतम पर्वतीय छिछली मिट्टी

13 – उच्च मैदानी मिट्टी

यह मिट्टी सामान्यतः 4000 km से अधिक ऊंचाई पर पाई जाती है | इसमें नमी कम तथा कार्बनिक पदार्थों की अधिकता होती है |

उत्तराखंड में भूमि मापने के लिए नाली व मुट्टी का प्रयोग होता है |
1 नाली 200 वर्ग मीटर
1 हेक्टेयर 50 नाली 10000 वर्ग मीटर

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