उत्तराखंड में गोरखा शासन (चौबीसी)
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उत्तराखंड में गोरखा शासन (चौबीसी)

उत्तराखंड में गोरखा शासन निम्न पर निर्भर था |

1- कर

2- दासता

3 – क्रूरता

दंड की प्रक्रिया

1 :- गोला दीप –

लोहे की गर्म छड़ को जो ज्यादा दूर तक ले जाएगा वह निर्दोष और जो नहीं ले जा पाया वह दोषी

2 :- कढ़ाई दीप

गर्म तेल में हाथ डालवाया जाता था |अगर जला तो दोषी अगर नहीं चला तो निर्दोष|

3 :- तराजू दीप

व्यक्ति को तोला जाता था अगर अगले दिन तक वजन बढ़ा तो दोषी माना जाता था और अगर नहीं बढ़ा तो निर्दोष |


उत्तराखंड में गोरखा शासन समाप्त करने के लिए

गिलेस्पी दून घाटी – नाला पानी युद्ध
जेo एसo वुड गोरखपुर क्षेत्र 6000 सैनिक के साथ
जनरल मार्ले काठमांडू 8000 सैनिकों के साथ 27 अप्रैल 1815
ऑक्टरलोनी सतलज यमुना के बीच का क्षेत्र रामगढ़ मलाओं 27 अप्रैल 1815 |

18वीं सदी में पूरा नेपाल 24 छोटी-छोटी रियासतों में बंटा था | कुछ समय पश्चात इन्हीं रियासत के राजा ने चौबीसी परगनों का एकीकरण किया था , तथा उसके पश्चात यह नेपाल कहलाया |

1778 में सिंह प्रताप शाह अपनी माता राजेंद्र लक्ष्मी के संरक्षण में शासक बना था | कुछ समय पश्चात उसके भाई रण बहादुर ने गद्दी पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत की | एवं 1786 में राजेंद्र लक्ष्मी की हत्या कर दी गई | तथा स्वयं प्रताप शाह का संरक्षण बन गया |

राजेंद्र लक्ष्मी एवं रण बहादुर दोनों ने ही साम्राज्य विस्तार वादी नीति अपनाई | तथा इसका नेपाल के अन्य पड़ोसी क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तराखंड में गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र प्रभावित हुए |

रणबहादुर ने 1790 में अमर सिंह थापा , हस्तीदल चौतरिया , शूरवीर सिंह थापा और जगजीत पांडेय सरदारों के नेतृत्व में एक सेना कुमाऊं और गढ़वाल पर आक्रमण के लिए भेजी | हवालाबाग के युद्ध में हर्ष देव जोशी ने गोरखाओं की सहायता की |

टिहरी के राजा सुदर्शन शाह के प्रयासों से अंग्रेज शासन के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत अंग्रेजों ने सहायता देना स्वीकार किया |

कर्नल गिलेस्पी ने नालापानी के युद्ध में 1815 में गोरखाओ का सेनापति बलभद्र शाह को परास्त किया था | किंतु गोरखाओ ने अपार वीरता का परिचय दिया था |

जेo एसo वुड को पूर्वी कुमाऊँ तथा गोरखपुर क्षेत्र से गोरखाओं को भगाने के लिए कहा गया था , किंतु जेo एसo वुड को पीछे हटना पड़ा |

इसी प्रकार जर्नल मार्ले को 8000 सैनिकों के साथ काठमांडू जीतने भेजा गया | किन्तु ब्रिटिश सेना को अपार क्षति पहुंची | एवं मार्ले ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया |

जनरल ऑक्टरलोनी को सतुलजयमुना के बीच के क्षेत्र को विजित करने का दायित्व सौंपा गया था | प्रारंभ में इसे सफलता नहीं मिली , तथा क्षेत्र में गोरखाओं के दो किले रामगढ़ और मलाऊ अमर सिंह थापा के अधीन थे | किंतु कूटनीति का प्रयोग करते हुए , ऑक्टरलोनी को सफलता मिली | तथा संपूर्ण गोरखा शक्ति मालाऊ के किले में सीमित हो गई , एवं ऑक्टरलोनी ने मालाऊ किले पर आक्रमण किया | और गोरखाओ ने अपार वीरता का परिचय दिया , किंतु अंततः अंग्रेजों की विजय हुई | इस विजय का महत्व गोरखाओं की वीरता का प्रमाण इससे सिद्ध होता है | कि इसी स्थान पर ऑक्टर लोनी ने ब्रिटिश सेना की पहली गोरखा रेजिमेंट का गठन किया | भारतीय सेना में आज भी यह गोरखा बटालियन “मलाऊ “के नाम से जानी जाती है |

27 अप्रैल 1815 को गोरखा और अंग्रेजो के बीच एक समझौता हुआ | जिसके तहत गोरखाओं को कुमाऊं क्षेत्र में अपने सभी के किले छोड़ने थे | 15 मई 1815 को अमर सिंह थापा ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए | किंतु पुनः वापस नेपाल जाकर बमशाह ने इसे मानने से इनकार कर दिया । फलस्वरूप मार्च 1816 में ऑक्टरलोनी ने काठमांडू पर आक्रमण किया | तथा गोरखाओं को परास्त किया |

इस प्रकार 4 मार्च 1816 को संगोली की संधि लागू हुई | जिसकी पहली शर्त एक दूसरे पर आक्रमण न करना थी | तथा एक दूसरे की साम्राज्य सीमा निर्धारित की गई | इस प्रकार आने वाले समय में कुमाऊँ तथा गढ़वाल के एक भाग में ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित हुआ | जबकि शेष भाग पर टिहरी रियासत की स्थापना हुई |

नोट – लाठो मंदिर , बाण गांव ,चमोली ( नाग देवता की पूजा की जाती है|)

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