उत्तराखंड में कला और संस्कृति

Share on facebook
Share on twitter
Share on pinterest
1 – भित्ति चित्रकला
2 – लोककला ऐपण , ज्योति मातृका
3 – प्रस्तर
4 काष्ठ शिल्प नागर शैली
5 – हस्तशिल्प कला कत्यूरी शैली
6 – मंदिर निर्माण चपटी छत वाले मंदिर

मानव संस्कृति के विकास में कला का विशेष महत्व है | प्राचीन समय से ही मानव प्रकृति में जो देखता था | उसे अभिव्यक्ति कला के माध्यम से करता है | जिससे कई संस्कृति का मूर्त रूप से सृजित होता है |

समय के साथ-साथ कला में उत्कर्ष होता रहा वास्तव में कला मनुष्य की पवित्र अनुभूति है | तथा उसकी आत्मा की अभिव्यक्ति है |

कला का उद्भव एवं विकास किसी विशेष स्थानीय समय पर नहीं हुआ | बल्कि अलग-अलग सभ्यताओं में उनके प्रवेश के सापेक्ष कला का विकास हुआ | यद्यपि वर्तमान में कला का भूमंडलीकरण हो चुका है | फिर भी भाव अभिव्यक्ति में विषमता का स्पष्ट रूप देखने को मिलता है |

प्रत्येक क्षेत्र की कला की अपनी विशेषता एवं प्रवृत्ति है | जिसका प्रभाव वहां की लोक कला , वास्तुकला कला एवं चित्रकला में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है | उत्तराखंड की लोक कला का अपना विशिष्ट स्थान है | एवं वास्तु , धातु , कास्ट , मूर्ति कला में स्पष्ट रूप से प्रभाव देखने को मिलता है |

1 – भित्ति कला

आदम जीवन में कला किसी ना किसी रूप में मानव जीवन से जुड़ी रहती है | मानव ने उसे आदम समाज में भी प्रकृति में जो भी देखा महसूस किया उसे पत्थरों , जानवरों की हड्डियों एवं सींगों के द्वारा चित्रित करने का प्रयास किया |

उत्तराखंड में भी प्रागैतिहासिक काल के चित्र लखुउद्यार , पेठशाल , हुगली , ग्वरख्या गुफा आदि ,अनेक स्थलों में देखने को मिले हैं |जहां पर मानव को शिकार करते हुए , नृत्य करते हुए एवं अनेक जीव जंतुओं के चित्रों का अंकन किया गया है |

इसके अलावा उत्तराखंड में भित्ति चित्रों का किसी ना किसी रूप में आज भी हमारे समाज में अस्तित्व रहा है | विवाह संस्कार , नवरात्रि आदि के साथ-साथ गजानन के चित्रों का अंकन किया जाता है | इन्हीं ज्योति मातृका कहा जाता है |

दुर्गा अष्टमी एवं हरेला पर्व के उत्सव पर दीवारों पर हाथों के चित्र का अंकन किया जाता है | जिन्हें दुर्गाथाप कहा जाता है | किंतु वर्तमान समय में यह आधुनिक रूप धारण कर चुका है | तथा अब कागज एवं कपड़ों पर चित्र बनाकर दरवाजे से लटकाए जाते हैं | जिन्हें पटचित्र कहा जाता है |

दीवारों पर लटकाए जाने वाले द्वारपत्र कहा जाता है | इसी प्रकार जन्मपत्री और पोथी पर विभिन्न चित्रों का अंकन होता है | यज्ञोपवीत संस्कार के समय कपाल में स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है | एवं आरती की थाली को शैली कला से अलंकृत किया जाता है |

पिछौड़ा कला कुमाऊं की महिलाओं द्वारा अपनी ओढ़नी पर बनाई जाती है | इसी प्रकार रंग , बर्श और अँगुलियों से कागज एवम घर के दरवाजे पर बनाए जाने वाले चित्र प्रकीर्ण चित्र कहलाते हैं |

दिवाली के अवसर पर घर के आंगन से लेकर तिजोरी तक लक्ष्मी के पैसे का अंकन होता था | जिन्हें लक्ष्मी पौ कहा जाता था |

2 – लोककला (ऐपण)

ऐपण का अर्थ होता है , लिखना या अंगुलियों से चित्र बनाना इसलिए ऐपण को आंकिक चित्रकला भी कहा जाता है |

इसमें विभिन्न मांगलिक अवसरों उत्सवों एवं पर्वों में किशोरियों एवं महिलाओं द्वारा चित्र बनाए जाते हैं | अलग अलग अवसरों में बनाए गए ऐपण का नाम परिवर्तित हो जाता है जैसे –

शिव की अर्चना के समय शिवपीड़ |

लक्ष्मी की पूजा के समय श्रीयंत्र बनाया जाता है

ऐपण में कोहली का ऐपण भी बनाया जाता है | इसी प्रकार मिट्टी , आटे से देवी-देवताओं के रंगीन चित्र बनाए जाते थे | जिन्हें डिकारे कहा जाता था |

3 – प्रस्तर

प्रस्तर कला आवश्यकतानुसार प्रयोग की जाती थी | यह एक व्यवसायी कला थी |तथा इसके चित्रकार स्थानीय भाषा में ओड कहलाते थे |

इस कला का प्रयोग भवन निर्माण , मंदिर निर्माण एवं मूर्तिकला में किया जाता था | जिसमें देवी – देवता , पशु पक्षी एवं जीव जंतुओं के चित्र बनाए जाते थे |

वर्तमान में इस कला का तीव्र गति से ह्रास हुआ है | मूर्ति कला में शिव की मूर्तियों की नक्काशी बारीकी से की गई है | किन्तु अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों को साधारण रूप से बनाया गया है|

4 – काष्ठ कला

इसका प्रयोग स्तंभों , भवन , मंदिर आदि के दरवाजों पर होता था | इसके अलावा खिलौने एवं मूर्ति के निर्माण में भी इसका प्रयोग होता था | इसका सर्वोत्तम उदाहरण कटारमल का सूर्य मंदिर है | जिसके दरवाजों में जो आज भी राष्ट्रीय संग्रहालय में रखे गए हैं |

5 – हस्तकला

हस्तकला का उपयोग आभूषण , कृषि , औजार , बर्तन , सिलाई , बुनाई आदि में किया जाता था | आभूषणों के निर्माण में स्वर्णकारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी |

तांबे , पीतल एवं लोहे के बर्तन प्राचीन समय से ही प्रयुक्त होते थे | ऊनी सूती तथा रेशमी वस्त्रों का निर्माण किया जाता था |

भोटिया जनजाति के लोग वस्त्र निर्माण में निपुण थे | पिथौरागढ़ , धारचूला एवं मुनस्यारी “कालीन” उद्योग के लिए प्रसिद्ध थे |

इसी तरह पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग रिंगाल से टोकरी , कंडी , मोस्ट आदि का निर्माण करते थे |

आधुनिक चित्रकारों में मुगल शहजादे सुलेमान शिकोह के साथ मुग़ल चित्रकार श्यामदास एवं हरदास आये थे | हरिदास के वंशजों ने गढ़वाल शैली का विकास किया | हरिदास के पुत्र हीरालाल को गढ़वाली शैली का प्रेणता कहा जाता है |

हरदास का पुत्र मंगतराम एवं मंगत राम के पुत्र मोलाराम (1743 – 1833 ) गढ़वाल शैली के प्रमुख चित्रकार थे |

मोलाराम 4 शासकों प्रदीपशाह , ललितशाह , जयकृत शाह एवं प्रद्युम्न शाह के संरक्षण में थे | मोलाराम के चित्रों की प्रमुख विशेषता थी | इनके चित्रों के साथ कवित्व समन्वय था |

Subscribe to our Newsletter

get notification in your email inbox when we share any post and update on our website. give your email detail below abnd join our exited community

Share this post with your friends

Share on facebook
Share on google
Share on twitter
Share on linkedin

Leave a Reply