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उत्तराखंड में कला और संस्कृति

1 – भित्ति चित्रकला
2 – लोककला ऐपण , ज्योति मातृका
3 – प्रस्तर
4 काष्ठ शिल्प नागर शैली
5 – हस्तशिल्प कला कत्यूरी शैली
6 – मंदिर निर्माण चपटी छत वाले मंदिर

मानव संस्कृति के विकास में कला का विशेष महत्व है | प्राचीन समय से ही मानव प्रकृति में जो देखता था | उसे अभिव्यक्ति कला के माध्यम से करता है | जिससे कई संस्कृति का मूर्त रूप से सृजित होता है |

समय के साथ-साथ कला में उत्कर्ष होता रहा वास्तव में कला मनुष्य की पवित्र अनुभूति है | तथा उसकी आत्मा की अभिव्यक्ति है |

कला का उद्भव एवं विकास किसी विशेष स्थानीय समय पर नहीं हुआ | बल्कि अलग-अलग सभ्यताओं में उनके प्रवेश के सापेक्ष कला का विकास हुआ | यद्यपि वर्तमान में कला का भूमंडलीकरण हो चुका है | फिर भी भाव अभिव्यक्ति में विषमता का स्पष्ट रूप देखने को मिलता है |

प्रत्येक क्षेत्र की कला की अपनी विशेषता एवं प्रवृत्ति है | जिसका प्रभाव वहां की लोक कला , वास्तुकला कला एवं चित्रकला में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है | उत्तराखंड की लोक कला का अपना विशिष्ट स्थान है | एवं वास्तु , धातु , कास्ट , मूर्ति कला में स्पष्ट रूप से प्रभाव देखने को मिलता है |

1 – भित्ति कला

आदम जीवन में कला किसी ना किसी रूप में मानव जीवन से जुड़ी रहती है | मानव ने उसे आदम समाज में भी प्रकृति में जो भी देखा महसूस किया उसे पत्थरों , जानवरों की हड्डियों एवं सींगों के द्वारा चित्रित करने का प्रयास किया |

उत्तराखंड में भी प्रागैतिहासिक काल के चित्र लखुउद्यार , पेठशाल , हुगली , ग्वरख्या गुफा आदि ,अनेक स्थलों में देखने को मिले हैं |जहां पर मानव को शिकार करते हुए , नृत्य करते हुए एवं अनेक जीव जंतुओं के चित्रों का अंकन किया गया है |

इसके अलावा उत्तराखंड में भित्ति चित्रों का किसी ना किसी रूप में आज भी हमारे समाज में अस्तित्व रहा है | विवाह संस्कार , नवरात्रि आदि के साथ-साथ गजानन के चित्रों का अंकन किया जाता है | इन्हीं ज्योति मातृका कहा जाता है |

दुर्गा अष्टमी एवं हरेला पर्व के उत्सव पर दीवारों पर हाथों के चित्र का अंकन किया जाता है | जिन्हें दुर्गाथाप कहा जाता है | किंतु वर्तमान समय में यह आधुनिक रूप धारण कर चुका है | तथा अब कागज एवं कपड़ों पर चित्र बनाकर दरवाजे से लटकाए जाते हैं | जिन्हें पटचित्र कहा जाता है |

दीवारों पर लटकाए जाने वाले द्वारपत्र कहा जाता है | इसी प्रकार जन्मपत्री और पोथी पर विभिन्न चित्रों का अंकन होता है | यज्ञोपवीत संस्कार के समय कपाल में स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है | एवं आरती की थाली को शैली कला से अलंकृत किया जाता है |

पिछौड़ा कला कुमाऊं की महिलाओं द्वारा अपनी ओढ़नी पर बनाई जाती है | इसी प्रकार रंग , बर्श और अँगुलियों से कागज एवम घर के दरवाजे पर बनाए जाने वाले चित्र प्रकीर्ण चित्र कहलाते हैं |

दिवाली के अवसर पर घर के आंगन से लेकर तिजोरी तक लक्ष्मी के पैसे का अंकन होता था | जिन्हें लक्ष्मी पौ कहा जाता था |

2 – लोककला (ऐपण)

ऐपण का अर्थ होता है , लिखना या अंगुलियों से चित्र बनाना इसलिए ऐपण को आंकिक चित्रकला भी कहा जाता है |

इसमें विभिन्न मांगलिक अवसरों उत्सवों एवं पर्वों में किशोरियों एवं महिलाओं द्वारा चित्र बनाए जाते हैं | अलग अलग अवसरों में बनाए गए ऐपण का नाम परिवर्तित हो जाता है जैसे –

शिव की अर्चना के समय शिवपीड़ |

लक्ष्मी की पूजा के समय श्रीयंत्र बनाया जाता है

ऐपण में कोहली का ऐपण भी बनाया जाता है | इसी प्रकार मिट्टी , आटे से देवी-देवताओं के रंगीन चित्र बनाए जाते थे | जिन्हें डिकारे कहा जाता था |

3 – प्रस्तर

प्रस्तर कला आवश्यकतानुसार प्रयोग की जाती थी | यह एक व्यवसायी कला थी |तथा इसके चित्रकार स्थानीय भाषा में ओड कहलाते थे |

इस कला का प्रयोग भवन निर्माण , मंदिर निर्माण एवं मूर्तिकला में किया जाता था | जिसमें देवी – देवता , पशु पक्षी एवं जीव जंतुओं के चित्र बनाए जाते थे |

वर्तमान में इस कला का तीव्र गति से ह्रास हुआ है | मूर्ति कला में शिव की मूर्तियों की नक्काशी बारीकी से की गई है | किन्तु अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों को साधारण रूप से बनाया गया है|

4 – काष्ठ कला

इसका प्रयोग स्तंभों , भवन , मंदिर आदि के दरवाजों पर होता था | इसके अलावा खिलौने एवं मूर्ति के निर्माण में भी इसका प्रयोग होता था | इसका सर्वोत्तम उदाहरण कटारमल का सूर्य मंदिर है | जिसके दरवाजों में जो आज भी राष्ट्रीय संग्रहालय में रखे गए हैं |

5 – हस्तकला

हस्तकला का उपयोग आभूषण , कृषि , औजार , बर्तन , सिलाई , बुनाई आदि में किया जाता था | आभूषणों के निर्माण में स्वर्णकारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी |

तांबे , पीतल एवं लोहे के बर्तन प्राचीन समय से ही प्रयुक्त होते थे | ऊनी सूती तथा रेशमी वस्त्रों का निर्माण किया जाता था |

भोटिया जनजाति के लोग वस्त्र निर्माण में निपुण थे | पिथौरागढ़ , धारचूला एवं मुनस्यारी “कालीन” उद्योग के लिए प्रसिद्ध थे |

इसी तरह पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग रिंगाल से टोकरी , कंडी , मोस्ट आदि का निर्माण करते थे |

आधुनिक चित्रकारों में मुगल शहजादे सुलेमान शिकोह के साथ मुग़ल चित्रकार श्यामदास एवं हरदास आये थे | हरिदास के वंशजों ने गढ़वाल शैली का विकास किया | हरिदास के पुत्र हीरालाल को गढ़वाली शैली का प्रेणता कहा जाता है |

हरदास का पुत्र मंगतराम एवं मंगत राम के पुत्र मोलाराम (1743 – 1833 ) गढ़वाल शैली के प्रमुख चित्रकार थे |

मोलाराम 4 शासकों प्रदीपशाह , ललितशाह , जयकृत शाह एवं प्रद्युम्न शाह के संरक्षण में थे | मोलाराम के चित्रों की प्रमुख विशेषता थी | इनके चित्रों के साथ कवित्व समन्वय था |

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