उत्तराखंड की संस्कृति ,भाषा एवं त्यौहार
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उत्तराखंड की संस्कृति ,भाषा एवं त्यौहार

संस्कृति सामान्य रूप से मानव जीवन की एक पद्धत्ति है | यह एक ऐसा नवीन पर्यावरण होता है | जिसका उद्भव मानव समुदाय के विचारों , संस्थाओं , दैनिक भाषा, उपकरण एवं अंतःकरण की भावना से होता है |

वास्तव में संस्कृति मानव समसय की समानताओं एवं विषमताओं के कार्मिक अध्ययन की कुंजी है | उत्तराखंड यधपि एक पहाड़ी राज्य है | फिर भी यहां पर अनेक धर्मों एवं जातियों के अस्तित्व के कारण एक विशिष्ट संस्कृति का उद्भव हुआ |

किसी भी स्थान की सभ्यता एवं संस्कृति को समझने के लिए वहाँ पर भाषा एवं समाज का अध्ययन आवश्यक हो जाता है |

उत्तराखंड की भाषा

उत्तराखंड में सामान्य रूप से हिंदी भाषा को आधिकारिक भाषा बनाया गया है | तथा जनवरी 2010 से संस्कृत को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया | परंतु क्षेत्र विशेष में भाषा के स्वरूप में परिवर्तन आता है | तथा उत्तराखंड की भाषा को चार भागों में बांटा जाता है |


1 – कुमाउँनी – उपतोली , सिराली , अस्कोटि , दानपुरिया , गंगाली आदि |
2 – गढ़वाली – गंगापरया , सैलानी , बदानी , राठी , माँझ , कुमइयां आदि |
3 – तराई क्षेत्र – मिश्रित भाषा का प्रयोग हिंदी , उर्दू , पंजाबी आदि |
4 – जनजातीयों की भाषा – उत्तराखंड में भोटिया , जौनसारी , धाक बोक्सा एवं राजी जनजातियां
पाई जाती है |

इनकी भाषा में भी व्यापक असमानता देखने को मिलती है | जैसे भोटिया लोगों की भाषा पर तिब्बतीय प्रभाव देखने को मिलता है | जबकि जौनसारी भाषा पर थोड़ा बहुत हिमांचली भाषा का प्रभाव देखने को मिलता है |

उत्तराखंड के प्रमुख त्यौहार

1 – घुघुतिया

यह मुख्य रूप से कुमाऊं क्षेत्र का त्यौहार है | इसमें आटे के टेढ़े मेढ़े घुघत बनाए जाते हैं | तथा यह सबसे पहले बच्चों द्वारा कऔ को खिलाए जाते हैं | गढ़वाल में इसी दिन मकर संक्रांति को खिचड़ी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है |

2 – बग्वाल

दीपावली को स्थानीय भाषा में बग्वाल कहा जाता है | बग्वाल में भैला नृत्य होता है | तथा पहाड़ी क्षेत्रों में दीपावली के ठीक 11वें दिन एक और दिवाली मनाई जाती है | जिसे ईगास कहा जाता है |

3 – घी संक्रांति या ओलगिया

इसमें कुमाऊं में घू – त्यार कहा जाता है | तथा किवदंती है , जो इस घी को नहीं खाता वह गंडेल बन जाता है |

4 – खतुडवा

ये मुख्य रूप से कुमाऊं में मनाया जाता है | तथा पशुओं का त्योहार है | इस दिन चीड़ के पेड़ की होलिका बनाकर उसे पिरूल से ढक दिया जाता है | इसे ही खतुडवा कहते कहा जाता है | बाद में इसे जला दिया जाता है इस गैत्यार भी कहते है |

5 – फूल संक्रांति / फूलदेई

ये बसंत के अपमान का त्यौहार है | चैत्र मास के आगमन के पहले दिन बच्चे टोकरियों में फूल चढ़ाते हैं यह त्यौहार एक माह तक चलता है |

6 – हरेला

यह सावन मास के प्रथम दिन मनाया जाता है | यह कुमाऊं क्षेत्र का त्यौहार है | इससे 10 दिन पूर्व 5 ,7 , 9 अनाज किसी बर्तन में बो दिए जाते हैं|

दसवें दिन इन्हें काटकर के देवी देवताओं एवं लोगों के सिरों पर रखा जाता है | वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण के लिए हरेला को वृक्षारोपण से जोड़ दिया गया है |

7 – चैतोली / चैत्वाली

यह पिथौरागढ़ में मनाया जाता है

8 – कलाई

कुमाऊँ फसल काटने के उपलक्ष में यह त्यौहार मनाया जाता है |

9 – भिरौली

कुमाऊँ संतान की प्राप्ति के लिए लिए ये त्यौहार मनाया जाता है |

10 – जागड़ा

यह जौनसार में महासू देवता से सम्बन्ध में मनाया जाता है |

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This Post Has One Comment

  1. Keshav semwal

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