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उत्तराखंड की नदियां भाग – 4

4 – यमुना नदी तंत्र

महाभारत के वनपर्व एवं विराट पर्व के अनुसार यमुना का उद्गम कालिंदी पर्वत से होता है | इसीलिए इसका नाम कालिंद या कालिंदी भी है | इसके अन्य नाम सूर्यतनया , यमी भी है |

माना जाता है की यहां पर आसित ऋषि की कुटिया थी | इसलिए इसे असिता नदी भी कहा जाता है | इसके अलावा महाभारत में तमसा नदी का भी उल्लेख मिलता है |

यमुना नदी का उद्गम बन्दरपूँछ माउट मैसिक में स्थित यमुनोत्री नामक स्थान से होता है |हालाँकि स्थानीय किवदंतियों के अनुसार इसका उद्गम सप्तसरोवर से हुआ था |

यमुनोत्री में सूर्यकुंड नामक गर्म कुंड है , जहां पर श्रद्धालु प्रसाद के रूप में आलू और चावल पकाते है |

यहां पर यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 1872 -1873 में टिहरी के नरेश प्रतापशाह द्वारा किया गया था | इसका पुनः निर्माण रानी गुलेरिया ने किया था | इस मंदिर के कपाट अक्षय तृतीय को खुलते है | एवं यम द्वितीया को बंद होते हैं |

इसके पश्चात यमुना ऋषिगंगा और हनुमान गंगा से मिलते हुए, देहरादून जनपद की सीमा में प्रवेश करती है | तथा यहां पर कालसी नामक स्थान पर यमुना अपने सबसे बड़ी सहायक नदी टौंस नदी से मिलती है।

तमसा नदी रूपिन और सुपिन दो नदियों से मिलकर बनी है | तथा टौंस नदी पर किसाऊ तथा इचारी बांध स्थित है।

इसके पश्चात डाकपत्थर में से एक नहर शक्तिनहर निकाली गई है । एवं इस नहर पर ठक्करानी एवं धालीपुर परियोजनाएं स्थित है। शक्तिनहर में आसारोड़ी से निकलने वाली आसन नदी मिलती है। ऋग्वेद में इसे आस्मान नदी कहा गया है ।

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