उत्तराखंड का भौगोलिक विभाजन - 2
उत्तराखंड का भौगोलिक विभाजन – 2
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उत्तराखंड का भौगोलिक विभाजन – 2

4 – दून और द्वार

यह मध्य हिमालय तथा शिवालिक के बीच स्थित 350 – 750 मीटर ऊँची घाटियों को पश्चिम में दून (जैसे – कोटादून, पछवाईन , हरकी दून, देहरादून, पतलीदून ( पौड़ी जिम कार्बेट ) तथा पूरब में द्वार जैसे – कोटद्वार कहा जाता है |

इन घाटी निर्माण उपजाऊ कॉप मिटटी से हुआ है | इसीलिए यहां पर धान , गेंहूं एवं गन्ना की उपज अधिक होती है |

यही कारण है की उत्तराखंड में सर्वाधिक जनसँख्या का संकेन्द्रण इसी क्षेत्र में स्थित देहरादून एवं हरिद्वार में मिलता है | ये जनसँख्या में उत्तराखंड के दो सबसे बड़े जिले है तथा उत्तराखंड की कुल जनसँख्या का लगभग 35% भाग इसी क्षेत्र में निवास करता है |

यहां पर चीड़ देवदार आंवला शीशम आदि पेड़ पाए है यहाँ पर चूना पत्थर एवं खड़िया की अधिकता है इसीलिए यहां पर सीमेंट उद्योग और संगमरमर पाया जाता है

5 – शिवालिक श्रेणी

इसे बाह्य हिमालय भी कहा जाता है | क्योंकि यह हिमालय का सबसे दक्षिणी एवं सबसे कम ऊंचाई वाली चोटी है | इसलिए इसे हिमालय का गिरीपाद या गिरीपद कहा जाता है |

यह उत्तराखंड में देहरादून ,हरिद्वार, पौड़ी, अल्मोड़ा, नैनीताल, चंपावत आदि जिलों में विस्तारित है | इसकी चौड़ाई 10 से 20 किलोमीटर तथा ऊंचाई 700 से 1200 मीटर है |

ये हिमालय के तीनों श्रेणियों में से सबसे नवीनतम पर्वत श्रेणी है | तथा इसमें जीवांश्म पाए जाते हैं | हिमालय से निकलने वाली नदियां शिवालिक श्रेणी को अनेक स्थानों पर काटती हैं | इसलिए यह श्रेणी खंडित अवस्था में है |

हिमालय की इसी श्रेणी में सर्वाधिक वर्षा लगभग 200 से 250 सेंटीमीटर होती है इसलिए उत्तराखंड में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान नरेंद्रनगर इसी श्रेणी में स्थित है |

इस श्रेणी में जंगल अधिक होते हैं जंगल अधिक होने के कारण यहां पर अब लकड़ी उद्योग विकसित अवस्था में है |

6 – भाबर

शिवालिक श्रेणी के ठीक दक्षिणी वाला भाग जहां पर हिमालय से निकलने वाली नदियां अपने साथ बहाकर लाई गए बड़े-बड़े कंकड़ पत्थर को छोड़ देती है तथा यहां पर हिमालय से निकलने वाली छोटी-छोटी नदियां अदृश्य हो जाती हैं। इसे भाबर कहा जाता है

यह क्षेत्र अत्याधिक अबउपजाऊ होता है एवं यहां पर घास एवं झाड़ियां उठती है।

7 – तराई

भाबर के ठीक दक्षिणी वाला भाग जहां पर अदृश्य नदियां पुनः प्रकट हो जाती है। उसे तराई कहा जाता है।

इसका निर्माण महीन कॉप मिट्टी से हुआ है। इसलिए यह अत्यंत उपजाऊ है। इसका विस्तार दक्षिण देहरादून से लेकर के चंपावत, उधम सिंह नगर तक है।

यहां पर धान, गन्ना एवं गेहूं की खेती अधिक होती है एवं अधिकतर आबादी पाई जाती है यहां पर दलदल अधिक पाए जाते हैं।

8 – मैदानी भाग

गंगा का मैदानी भाग हरिद्वार के ठीक दक्षिणी भाग में स्थित है | यह मैदानी भाग कॉप मिट्टी से निर्मित है , एवं अधिक उपजाऊ होता है |तथा इसे दो भागों में बांटा जाता है |

पहला बांगर पुरानी जलोढ़ मिट्टी से बने उच्च मैदानी भाग को बांगर कहा जाता है |

दूसरा खादर नई जलोढ़ मिट्टी से बने निम्न मैदानी भागों को खादर कहा जाता है इनके बनने की अवस्था निरंतर चलती रहती है |

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