उत्तराखंड राज्य के गठन / पृथक राज्य आंदोलन के कारण
उत्तराखंड राज्य के गठन / पृथक राज्य आंदोलन के कारण
Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp

उत्तराखंड राज्य के गठन / पृथक राज्य आंदोलन के कारण

भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विषमता
प्रशासनिक शिथिलता एवं अलगाव
अनअद्यौगिकरण एवं पलायन
प्राकृतिक आपदाएं
सामरिक महत्व

प्राकृतिक सौंदर्य एवं अपनी विशिष्ट भौगोलिकता के कारण उत्तराखंड पूरे देश में अलग स्थान रखता है | संगोली संधि के पश्चात इस क्षेत्र पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया |

अंग्रेजों ने इस क्षेत्र के प्राकृतिक संपदा का अनियंत्रित और अनियमित रूप से विदोहन करना प्रारंभ किया | और स्वतंत्रता के बाद भी लगातार यह चलता रहा | इस हिमालयी क्षेत्र के लिए कोई नीति या नियोजन ना होने के कारण पर्यावरण संकट जैसी समस्याएं खड़ी हो गई |

वहीं सरकारी शिथिलता रवैया के कारण क्षेत्र विकास से भी दूर रहा फलस्वरूप स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय समस्याओं एवं विकास के अभाव को देखते हुए , उत्तराखंड राज्य की मांग को एक सार्थक कदम माना एवं समय समय पर इसकी मांग उठाते रहे |

उत्तराखंड राज्य के गठन के पीछे कई कारण मौजूद थे | जिनमें से प्रमुख कारण उत्तराखंड का उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों से भौगोलिक एवं सांस्कृतिक रूप से भिन्न होना था | जहां पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सरकार की विकास योजनाएं पहाड़ों तक नहीं पहुंच पा रही थी | वही खान-पान , रहन-सहन एवं भाषा बोली के आधार पर यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश के अन्य भागों से भिन्न था |

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण आधारभूत संरचनाओं का विकास नहीं हो पाया | तथा इसने जनता में एक आक्रोश की भावना पैदा की |

उत्तराखंड राज्य की स्थापना कोई एकाएक हुई घटना नहीं थी | बल्कि लंबे समय तक चल रहे राजनीतिक आंदोलनों का परिणाम थी | जिसका कारण प्रशासनिक शिथिलता एवं स्थानीय लोगों का प्रशासन से अलगाव था |

यहां पर नियुक्त अधिकारी अपनी नियुक्ति को एक सजा मानते थे | इसलिए विकास को प्रमुखता देने के बजाय , समय व्यतीत करने पर बल दे देते थे | अस्पताल तो खोले गए थे | किंतु वहां पर दवाइयों और चिकित्सकों का अभाव होता था | कागजों पर स्कूल , बिना भवनो एवं शिक्षकों के खोले जाते थे |

सरकारों द्वारा चलाई जा रही विकास योजनाओं का क्रियान्वयन सही प्रकार से नही हो पाता था | वहीं राजधानी से अधिक दूर होने के कारण स्थानीय शासन प्रशासन एवं नीतियों से अनभिज्ञ थी| जनप्रतिनिधियों द्वारा क्षेत्र के सभी निवासियों का उपयोग केवल वोट बैंक के रूप में होता था |

यहां की प्राकृतिक संसाधनों का विस्तृत पैमाने पर विदोहन किया गया | किंतु किसी भी उद्योग के स्थानीयकरण नहीं किया गया | जिस कारण स्थानीय लोगों के समक्ष रोजगार एक प्रमुख समस्या बनकर खड़ा हुआ | तथा दीन हीन कृषि आजीविका चलाने में सक्षम नहीं थी | तो फलस्वरूप स्थानीय लोगों एवं युवाओं ने मैदानों की तरफ पलायन करना शुरू किया | तथा हरे-भरे आवाद पहाड़ विरान होने लगे |

सरकार ने विकास कार्य के लिए जैसे सड़क निर्माण आदि के लिए पहाड़ों में अनेक विस्फोट किए | इन विस्फोटों ने भूस्खलन के रूप में एक नई समस्या को जन्म दिया | इसके अलावा सूखा बाढ़ एवं भूकंप से क्षेत्र निरंतर प्रभावित रहा था |

आपदा के समय सरकार द्वारा कोई त्वरित राहत जनता तक नहीं पहुंचाई जाती थी | और ना ही आपदा प्रबंधन के लिए विशेष नीति बनाई गई थी | इसलिए प्रशासनिक अनदेखी ने ही जनता में असंतोष पैदा किया | एवं जनता आंदोलन के लिए मजबूर हुई |

उत्तराखंड भारत का एक सीमांत क्षेत्र था | जिसका अपना एक सामरिक महत्व था | इस महत्व को जनता ने 1962 के भारत – चीन युद्ध में भी महसूस किया था | इसलिए यहां पर मजबूत आधारभूत संरचना एवं एक प्रशासनिक तंत्र का होना आवश्यक था | जो आवश्यकता पड़ने पर अपने कार्य को सुचारु रुप से कर सकें| इसलिए जनता को पृथक राज्य ही अंतिम विकल्प दिखा |

Subscribe to our Newsletter

get notification directly in your email.
whenever we post an article or Video lecture on our website, you will be notified through our newsletter. Write down your email ID in the box Below and join our exciting community.

Share this post with your friends

Share on facebook
Share on google
Share on twitter
Share on linkedin

Leave a Reply