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उत्तराखंड में राष्ट्रीय आंदोलनों का प्रभाव
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उत्तराखंड में राष्ट्रीय आंदोलनों का प्रभाव

उत्तराखंड की सभी राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही | किंतु भारत में राष्ट्रीय आंदोलन , जहां ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ , भारत में उत्तरदाई शासन की स्थापना , जनता के अधिकार एवं स्वतंत्रता से प्रेरित था |वहीं उत्तराखंड में राष्ट्रीय आंदोलन का आधार यहां की स्थानीय समस्याएं जैसे जल , जंगल , जमीन , कुली बेगार आदि से प्रेरित था |

1857 में उत्तर तथा मध्य भारत में व्यापक स्तर पर विद्रोह हुआ था | तथा पूरी जनता में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आक्रोश की भावना व्याप्त थी , वहीं उत्तराखंड क्षेत्र में इस आंदोलन का इतना व्यापक प्रभाव देखने को नहीं मिलता इसके कुछ कारण थे |

जैसे – गोरखाओं की अपेक्षा अंग्रेजों का न्यायपूर्ण शासन, नरेश सुदर्शन शाह का अंग्रेजों को समर्थन देना , कुमाऊ के कमिश्नर रैम्जे की लोकप्रियता एवं इस क्षेत्र में शिक्षा और संचार का अभाव आदि प्रमुख कारण थे |

किंतु हम यह नहीं कह सकते , कि 1857 की क्रांति से उत्तराखंड पूरा अछूता रहा | क्योंकि अल्मोड़ा , नैनीताल , हल्द्वानी , श्रीनगर आदि , क्षेत्रों में छिटपुट घटनाएं हुई थी |

इसी आंदोलन के दौरान चंपावत के गांव के निवासी कालू मेहरा ने गुप्त रूप से क्रांतिकारी संगठन “क्रांतिवीर” का गठन किया | तथा इन्हें उत्तराखंड का पहला स्वतंत्रता सेनानी होने का गौरव प्रदान है |

1870 में अल्मोड़ा में डिबेटिंग क्लब की स्थापना हुई | इस संगठन ने इस क्षेत्र में राष्ट्रवाद की उदारवादी विचारधारा के माध्यम से जनचेतना को जगाने का प्रयास किया |

1901 में तारादत्त गैरोला ने गढ़वाल यूनियन या गढ़वाल हितकरिणी सभा का गठन किया | इस संगठन ने कुली बेगार की समस्याओं को उठाया | एवं गिरजादत्त नैथानी ने 1930 में गढ़वाल समाचार एवं 1905 में गढ़वाल मासिक पत्रिका के माध्यम से इस संगठन के विचारों के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |

वहीं दूसरी ओर 1886 में कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन कलकत्ता में हुआ | जिसमें उत्तराखंड क्षेत्र से ज्वालादत्त जोशी ने भाग लिया था |

1897 में दयानंद सरस्वती हरिद्वार आए | एवं उन्होंने हरिद्वार में पाखंडी खंडणी पताका लहराई | तथा स्थानीय लोगों के निमंत्रण पर भी देहरादून भी आए | एवं धार्मिक चेतना का प्रसार किया |

इस समयांतराल में उत्तराखंड के राजनैतिक फलक पर गोविंद बल्लभ पंत का पार्दुभाव हुआ | इन्होंने 1903 में अल्मोड़ा में हैम्पी क्लब की स्थापना की |

1912 में ज्वालादत्त जोशी , सदानंद सनताल एवं हरिराम पांडेय आदि लोगों के प्रयास से अल्मोड़ा कांग्रेस का गठन किया गया | जिसने क्षेत्र में कांग्रेसी विचारधारा के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |

1915 में गांधी जी देहरादून आए | और इसी दौरान 1914 – 1918 तक प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था | इस युद्ध में गढ़वाल बटालियन के गब्बर सिंह और दरबान सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा उन्हें विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया |

1916 में विक्टर मोहन जोशी , चिरंजीलाल एवं बद्री दत्त पांडे के प्रयासों से होमरूल लीग आंदोलन की स्थापना हुई | बद्रीदत्त पांडे को कुमाऊं केसरी के नाम से जाना जाता है | इन्होंने कुमाऊं का इतिहास नामक पुस्तक लिखी थी |

1916 में गोविंद बल्लभ पंत तथा प्रेम बल्लभ पंत ने कुमाऊं परिषद का गठन किया | इस परिषद का पहला अधिवेशन 1917 में अल्मोड़ा में हुआ | इसकी अध्यक्षता जयदत्त जोशी ने की थी | इस सम्मेलन में कुली बेगार प्रथा के खिलाफ व्यापक स्तर पर जनआंदोलन चलाए जाने का निर्णय लिया गया |

फरवरी 1921 में उत्तरायणी मेले के दिन हजारों की संख्या में कार्यकर्ता सरयू नदी के किनारे बागेश्वर में एकत्र हुए | तथा कुली बेगार के रजिस्टर सरयू नदी में बहाएं |

1923 में स्वराज पार्टी का गठन हुआ था | गोविंद बल्लभ पंत एवं हरगोविंद पंत ने इस क्षेत्र में स्वराज पार्टी का नेतृत्व किया | एवं गोविंद बल्लभ पंत को संयुक्त प्रांत में स्वराज दल का नेता घोषित किया गया |

1918 में अनुसूया प्रसाद बहुगुणा एवं बैरिस्टर मुकुंदी लाल के नेतृत्व में गढ़वाल की कांग्रेस कमेटी का गठन किया | इन दोनों नेताओं ने 1919 में रोलेट एक्ट के खिलाफ अमृतसर में बुलाए गए , कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया | अनुसूया प्रसाद बहुगुणा को गढ़ केसरी के नाम से जाना जाता है |

असहयोग आंदोलन के दौरान टिहरी राज्य में भी वन नीति के खिलाफ गोपाल सिंह राणा ने असहयोग वन आंदोलन चलाया | उन्हें क्षेत्र में आधुनिक किसान आंदोलन का जनक कहा जाता है |

1929 में गांधी जी ने कौसानी प्रवास किया | तथा यहीं पर अनासक्ति आश्रम की स्थापना की | एवं भगवत गीता पर अनासक्ति योग नामक टीका लिखी | तथा कौसानी को भारत का स्विट्जरलैंड कहा था |

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान इस क्षेत्र में वन , लगान एवं मद्य निषेध प्रमुख मुद्दे रहे | तथा इसी दौरान 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में 3118 के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में सैनिकों ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया | यह घटना इतिहास के पन्नों में पेशावर कांड के नाम से जानी जाती है | 1960 सबसे पहले वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तर प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैण बनाने की मांग की थी | उनकी समाधि दूधातोली में है | इन्हीं के नाम पर गैरसैण का नाम चंद्रनगर रखा गया था |

1930 में दुगड्डा में एक सम्मेलन का आयोजन हुआ | इस सम्मेलन की अध्यक्षता प्रताप सिंह नेगी एवं उपाध्यक्ष कृष्ण राम मिश्रा ने की ।

जून 1930 में पौड़ी गढ़वाल में एक राजनैतिक सम्मेलन बुलाया गया | तथा स्थानीय समस्याओं पर विचार किया गया |

उत्तराखंड क्षेत्र से पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही जगमोहन नेगी थे | तथा इससे पूर्व 1937 में शांति राम त्रिवेदी ने अल्मोड़ा के सोमेश्वर में गांधी आश्रम की स्थापना की |

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 25 अगस्त 1942 को अल्मोड़ा के सालम क्षेत्र में पुलिस तथा जनता के बीच मुठभेड़ हुई | जिसमें कुछ लोग शहीद हुए ।

5 सितंबर 1942 को सल्ट के खुमाड़ क्षेत्र में पुलिस ने कांग्रेस मुख्यालय पर गोलियां चलाई | इस घटना को सल्ट कांड के नाम से जाना जाता है | गांधीजी ने इस महत्व को देखते हुए इसे उत्तराखंड का बारदोली कहा है

नोट – गुजड़ू को गढ़वाल का बारदोली कहा जाता है ( गुडजु, सालम)

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